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Monday, 23 January 2017

वृद्ध और बेटा

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‎Anil Yadav‎ to beto Se pyari Betiya hoti h..
April 18 at 6:57am ·
एक बेटा अपने वृद्ध पिता को रात्रि भोज के लिए एक अच्छे रेस्टॉरेंट में लेकर
गया।
खाने के दौरान वृद्ध पिता ने कई बार भोजन अपने कपड़ों पर गिराया।
रेस्टॉरेंट में बैठे दूसरे खाना खा रहे लोग वृद्ध को घृणा की नजरों से देख रहे थे
लेकिन वृद्ध का बेटा शांत था।
खाने के बाद बिना किसी शर्म के बेटा, वृद्ध को वॉश रूम ले गया। उनके
कपड़े साफ़ किये, उनका चेहरा साफ़ किया, उनके बालों में कंघी की,चश्मा
पहनाया और फिर बाहर लाया।
सभी लोग खामोशी से उन्हें ही देख रहे थे।बेटे ने बिल पे किया और वृद्ध के
साथ
बाहर जाने लगा।
तभी डिनर कर रहे एक अन्य वृद्ध ने बेटे को आवाज दी और उससे पूछा " क्या
तुम्हे नहीं लगता कि यहाँ
अपने पीछे तुम कुछ छोड़ कर जा रहे हो ?? "
बेटे ने जवाब दिया" नहीं सर, मैं कुछ भी छोड़ कर
नहीं जा रहा। "
वृद्ध ने कहा " बेटे, तुम यहाँ
छोड़ कर जा रहे हो,
प्रत्येक पुत्र के लिए एक शिक्षा (सबक) और प्रत्येक पिता के लिए उम्मीद
(आशा)। "
आमतौर पर हम लोग अपने बुजुर्ग माता पिता को अपने साथ बाहर ले जाना
पसंद नहीँ करते
और कहते हैं क्या करोगे आप से चला तो जाता
नहीं ठीक से खाया भी नहीं जाता आप तो घर पर ही रहो वही अच्छा
होगा.
क्या आप भूल गये जब आप छोटे थे और आप के माता पिता आप को अपनी
गोद मे उठा कर ले जाया
करते थे,
आप जब ठीक से खा नही
पाते थे तो माँ आपको अपने हाथ से खाना खिलाती थी और खाना गिर
जाने पर डाँट नही प्यार जताती थी
फिर वही माँ बाप बुढापे मे बोझ क्यो लगने लगते हैं???
माँ बाप भगवान का रूप होते है उनकी सेवा कीजिये और प्यार दीजिये...
क्योंकि एक दिन आप भी बूढ़े होँगे फिर अपने बच्चों से सेवा की उम्मीद मत
करना.

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Thursday, 14 April 2016

दलितों के लिए सरकार ने मातृ भाषा तक में शिक्षा दुर्लभ कर दी है



ईश्वर ने तो सबको एक समान बना कर भेजा है। समाज ने खुद खाई खोदी है। प्रकृति की तरफ से बाढ़,भूकंप, तूफान आदि प्रकोप के समय मनुष्य-मनुष्य में भेद नहीं किया जाता है। परंतु आज यह भेदभाव देख कर कर लगता है कि, लोग परमात्मा और प्रकृति के विपरीत आचरण कर रहे हैं इसी कारण समाज दुखी है।  

Wednesday, 23 September 2015

ईंट उठाना ज़्यादा अच्छा है


शिक्षा का स्तर क्या हो गया है? इससे तो अच्छा है अनपढ़ ही रहें । इससे तो ईंट  उठाना ज़्यादा अच्छा है। पर सबको ईंट उठाने का भी काम मिलता कहाँ है? क्या बनना है बच्चे नहीं तय करते उनके अभिभावक खांचे में फिट कर देते हैं। शिक्षा के विकास के बदले विनाश ही हो रहा है। न तो शिक्षक समझते हैं न ही माता-पिता। धनवान बनने के बजाए चरित्रवान बनना सिखाएँ माता-पिता।
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Saturday, 6 October 2012

मिल गई

बुधवार, 17 नवम्बर 2010

मिल गई




(लेखिका ---श्रीमती पूनम माथुर )

आज पडौस में काफी रौनक है ,क्या बात है?हर कोई एक दूसरे से पूछ रहा ,ऐसा लगता है कि जैसे पडौसी क़े घर में कोई लाटरी निकल आयी हो;कल तक तो सारे क़े सारे लोग उदास थे .परन्तु आज अचानक ये कैसा परिवर्तन हो गया है .
सभी हैरान हैं ,परन्तु पूछने क़े लिए तो हिम्मत  जुटानी पड़ती है. कल तक तो उनके घर में रोटी -दाल क़े लिए भी कशमकश था .जब  से उनकी सरकारी नौकरी छूटी ,उन्होंने कई जगह अपना भाग्य आजमाया ,लेकिन कहीं भी सफल नहीं हो पाए .शायद पूंजी की कमी बार -बार सामने आती थी ,परन्तु आज ये कैसा बदलाव आ गया .बड़ी मुश्किलों में बेचारों ने अपने घर को बचाए रखा था .मियां -बीबी ,दो बच्चे और बूढ़ी विधवा माँ ,महंगाई दिन पर दिन बढ़ती चली जा रही थी .बेटी का अचानक आपरेशन ,माँ की अस्थमा की बीमारी .सभी का लालन -पालन ,पढ़ाना-लिखाना ,मियां -बीबी पर क्या बीतती होगी ?बड़े कठोर परिश्रम में उन्होंने अपने घर को हर आंधी -तूफ़ान से बचाया है.कालोनी में उनका मेल -जोल समयानुसार था. उनके घर में हमेशा तन्गी रहती थी ;परन्तु उनमे गज़ब का धैर्य था . घर वाले कभी -कभी तो हताश हो जाते थे ,परन्तु निराशा उनके सामने नहीं आ पाती .उन्होंने अपनी हिम्मत और अन्दर की शक्ति से दुनिया में लड़ाई लड़ी और उसके ऊपर विजय पायी है. कभी भी हार  कर वे उदास नहीं होते थे और हमेशा अपने चित्त को शान्त रखने की बात किया करते रहे ताकि घर वालों को हिम्मत मिलती रहे .दिखावा तो नहीं करते थे ,लेकिन ईश्वर में उन्हें अटूट श्रद्धा  और  विश्वास था,इसी विश्वास क़े आधार पर वे दुनिया से टक्कर ले लेते थे .अपने लालन -पालन की प्रक्रिया में उन्होंने पुराने युग और आधुनिकता की अच्छाईयों को समेटा था और बुराईयों को भले ही किसी भी काल से सम्बंधित हों ,को नहीं अपनाया .सिगरेट  -तम्बाकू से बहुत दूर थे ,अपने बच्चों को धैर्य और लगन की शिछा दिया करते थे .दुनिया की चकाचौंध से दूर रहने को कहा करते थे .अगर इंसान में हिम्मत है तो वह बड़े से बड़ा काम चुटकियों में भी कर सकता है. बच्चों को उनकी शिक्षा  का फल प्राप्त हुआ .वे हमेशा अपने माता -पिता क़े बताये हुए रास्ते पर ही चला करते हैं ताकि उन्हें सफलता प्राप्त होती रहे.
आज उसी का परिणाम तो उन बच्चों को मिला है. सच्ची सीख और सच्चे आचरण क़े आधार पर वे बच्चे कामयाब हो गए हैं ,उन्हें भी काफी खुशी है. कुछ लोगों ने आकर पूंछा आज आपके घर में क्या बात हुयी है?कोई लाटरी निकल आयी है. आज आप खुश नजर आ रहे हैं. तो उन्होंने जवाब दिया भैया आज हमारे बेटे को नौकरी मिल गई है;वह भी I .A . S . की .वर्षों की मेरी तपस्या सफल हुयी हैउनकी आँखों से आंसू निकल पड़े .
सभी ने कहा धैर्य और मेहनत का फल आज अपने आप मिल गया.


(यह कहानी २००३ में लिखी थी जो ५ -११ जून क़े ब्रह्मपुत्र समाचार , आगरा में प्रकाशित हुयी थी ;आज जब आपा -धापी चल रही है इसका महत्त्व ज्यों का त्यों बना हुआ है .अतः यहाँ पुनः प्रकाशित किया जा रहा है .इससे पूर्व उनकी एक और कहानी - "मानवता की सेवा " इसी ब्लॉग में प्रकाशित हो चुकी है ,वह भी मानवीय संवेदनाओं पर आधारित है. )     
 
 

4 टिप्‍पणियां:

  1. मानवीय संवेदनाओं पर आधारित सही शिक्षा देती कहानी|
  2. सुन्दर शिक्षापरक कहानी बहुत पसन्द आयी।
  3. कहानी काफी समय पहले लिखी गयी गयी है पर सदैव प्रासंगिक रहेगी...... जीवन मूल्यों को समझाती एक सुंदर रचना .....
  4. जोशी जी ,वंदना जी,मोनिका जी ,
    आप सब लोगों को मेरा उत्साहवर्धन करने के लिए बहुत -बहुत धन्यवाद .
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    पूनम