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Monday, 13 November 2017
Wednesday, 21 June 2017
Saturday, 8 April 2017
Wednesday, 15 March 2017
Monday, 16 January 2017
Monday, 2 November 2015
Saturday, 27 June 2015
देखा जीवन --- पूनम माथुर
ज़िंदगी को हमने तबाह और बर्बाद होते देखा
हर चंद घुट-घुट कर सांस लेते हुये देखा
कोई किसी का नहीं होता यह बात हमने अपनी आँखों से देखा
तबाही का मंजर है जीवन पल-पल घुटते हुये देखा
अपनों को हमने दूसरों में बदलते हुये देखा
चंद पैसों के आगे सबको गुलाम होते हुये देखा
सच को झूठ में तब्दील होते हुये देखा
इंसानियत को हैवानियत में बदलते हुये देखा
मिट्टी (तन )को मिट्टी का सौदा करते हुये देखा
अपनों को अपनों से आँख चुराते हुये देखा
पूर्णिमा को अमावस्या में जाते हुये देखा।
हर चंद घुट-घुट कर सांस लेते हुये देखा
कोई किसी का नहीं होता यह बात हमने अपनी आँखों से देखा
तबाही का मंजर है जीवन पल-पल घुटते हुये देखा
अपनों को हमने दूसरों में बदलते हुये देखा
चंद पैसों के आगे सबको गुलाम होते हुये देखा
सच को झूठ में तब्दील होते हुये देखा
इंसानियत को हैवानियत में बदलते हुये देखा
मिट्टी (तन )को मिट्टी का सौदा करते हुये देखा
अपनों को अपनों से आँख चुराते हुये देखा
पूर्णिमा को अमावस्या में जाते हुये देखा।
Monday, 15 September 2014
Tuesday, 17 June 2014
ज़िंदगी
ज़िंदगी एक सम्झौता है
कौन कहता है फैसला होता है?
ज़िंदगी की राह बहुत टेढ़ी है
इस पर चलना मनुष्य की मजबूरी और बेड़ी है।
हँसना बहुत ज़रूरी होता है
पर रोना क्या सभी को आता है?
माँ तो माँ होती है बाप तो बाप होता है
क्या किसी को दोनों के जैसा स्नेह लुटाने आता है?
कौन कहता है फैसला होता है?
ज़िंदगी की राह बहुत टेढ़ी है
इस पर चलना मनुष्य की मजबूरी और बेड़ी है।
हँसना बहुत ज़रूरी होता है
पर रोना क्या सभी को आता है?
माँ तो माँ होती है बाप तो बाप होता है
क्या किसी को दोनों के जैसा स्नेह लुटाने आता है?
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