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Saturday, 7 July 2018

“ये बिल क्या होता है माँ ?” -------- एकता जोशी

एकता जोशी
07-07-2018 

“ये बिल क्या होता है माँ ?” 
8 साल के बेटे ने माँ से पूछा।

माँ ने समझाया -- “जब हम किसी से कोई सामान 
लेते हैं या काम कराते हैं, तो वह उस सामान या काम
के बदले हम से पैसे लेता है, और हमें उस काम या
सामान की एक सूची बना कर देता है, 
इसी को हम बिल कहते हैं।”

लड़के को बात अच्छी तरह समझ में आ गयी। 
रात को सोने से पहले, उसने माँ के तकिये के नीचे 
एक कागज़ रखा, 
जिस में उस दिन का हिसाब लिखा था।

पास की दूकान से सामान लाया 5रु 
पापा की bike पोंछकर बाहर निकाली। 5 रु 
दादाजी का सर दबाया 10 रु 
माँ की चाभी ढूंढी 10 रु
कुल योग 30 रु

यह सिर्फ आज का बिल है , 
इसे आज ही चुकता कर दे तो अच्छा है।

सुबह जब वह उठा तो उसके तकिये के नीचे 30 रु. 
रखे थे। यह देख कर वह बहुत खुश हुआ 
कि ये बढ़िया काम मिल गया।

तभी उस ने एक और कागज़ वहीं रखा देखा।
जल्दी से उठा कर, उसने कागज़ को पढ़ा। 
माँ ने लिखा था --

जन्म से अब तक पालना पोसना -- रु 00
बीमार होने पर रात रात भर 
छाती से लगाये घूमना -- रु 00
स्कूल भेजना और घर पर 
होम वर्क कराना -- रु 00
सुबह से रात तक खिलाना, पिलाना, 
कपड़े सिलाना, प्रेस करना -- रु 00 
अधिक तर मांगे पूरी करना -- रु 00
कुल योग रु 00

ये अभी तक का पूरा बिल है, 
इसे जब चुकता करना चाहो कर देना।

लड़के की आँखे भर आईं
सीधा जा कर माँ के पैरों में झुक गया
और मुश्किल से बोल पाया --

“तेरे बिल में मोल तो लिखा ही नहीं है माँ,
ये तो अनमोल है,"
इसे चुकता करने लायक धन तो
मेरे पास कभी भी नहीं होगा। 
मुझे माफ़ कर देना , माँ।“

माँ ने," हँसते हुए" उसे गले से लगा लिया ।

बच्चों को ज़रूर पढ़ायें यह मेरा निवेदन है ......
भले ही आपके बच्चे माँ बाप बन गए हो ।

साभार : 
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=218948045396891&set=a.108455693112794.1073741829.100018450913469&type=3

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Monday, 31 July 2017

जैसे इस सुकून के लिए सदियाँ गुजर गयी





My feelings
July 20 at 9:58pm 
*एक शिक्षिका की कलम से....*

कितना मुश्किल होता है एक माँ के लिए छोटे बच्चे को सोता हुआ छोड़कर घर से बाहर अपने जॉब पर जाना ? इस तकलीफ को सिर्फ एक माँ ही समझ सकती है !

बच्चा उठेगा मम्मा मम्मा करके थोड़ी देर रोएगा, जब माँ नही दिखेगी तो चुपचाप चप्पल पहन कर अपनी दादी या घर के किसी बड़े सदस्य के पास चला जाएगा। समय से पहले ऐसे बच्चे बड़े व जिम्मेदार होते जाते हैं, लेकिन माँ अपने जिम्मेदार बच्चे को भरी आँखों से ही देखती है, कि भला अभी इसकी उम्र ही क्या है ?

पता नही एक माँ में इतनी हिम्मत इतनी ममता इतनी ताकत आती कहाँ से है ? किसी से कुछ कहती भी नही। बस आँखे भरती है, डबडबा जाती है, फिर खुद को कंट्रोल करती हुई भरी आँखों को सुखा लेती है।

जॉब के साथ साथ घर परिवार संभालना, बच्चों के टिफिन से लेकर हसबैंड के कपड़ो तक, ब्रेकफास्ट से लेकर रात के डिनर तक, कितना बेहतर मैनेज करती है फिर भी मन में लगा रहता है कि बच्चे को बादाम पीस कर नही दे पाई वो ज्यादा फायदा करता। कहीं न कहीं कुछ छूटा छूटा सा लगा रहता है।

इतना काम अगर स्त्री अपने मायके में करे तो वहां उसको बहुत तारीफ और प्रोत्साहन मिले या कह लें कि वहां उसे कोई करने ही न दे, सब सहयोग करें।

बच्चे का नाश्ता खाना सब बना कर जाना, फिर बच्चे ने क्या खाया क्या नही ? इसकी चिंता में लगे रहना।
सच में एक माँ घर से बाहर, बच्चे से दूर कभी रिलेक्स ही नही रह पाती। घर पहुँचो तो बच्चे के टेढ़े मेढ़े बाल, गलत ढ़ंग से बंद हुआ शर्ट का बटन देखकर एक साथ बेहद ख़ुशी और पीड़ा दोनों होती है, मुँह फिर भी कुछ नही बोलता बस आँखों को रोकना मुश्किल हो जाता है। बच्चे के सामने सब कुछ ज़ब्त करके प्यारी मुस्कान देना एक माँ के ही बस का काम है।

बाहर से जितनी मजबूत अंदर से उतनी ही कमजोर होती हैं माँ। सुबह से छूटा हुआ बच्चा जब दौड़कर गले लगता है तो मानो सारी कायनात की खुशियाँ मिल गयी, फिर वैसी ख़ुशी वैसा सुकून स्वर्ग में भी नही मिले। सारे दिन की भागदौड़ भूलकर उस पल ऐसा लगता है कि जैसे इस सुकून के लिए सदियाँ गुजर गयी।


कभी कभी सोचती हूँ कि जेंट्स लोग जो इतने रिलेक्स रहते है परिवार और बच्चों की तरफ से उसमे बहुत बड़ा हाथ स्त्रियों का होता है।

एक पुरुष आफिस से लौटता है तो कहीं चौराहे पर चाय पीते हुए अपने दोस्तों के साथ गप्पें मारता है फिर रात तक घर आता है उसी जगह एक स्त्री अपने काम को खत्म करने के बाद सिर्फ और सिर्फ अपने घर अपने बच्चे के पास पहुंचती है जबकि अच्छा उसे भी लगता है बाहर अपनी फ्रेंड्स के साथ गपशप करते हुए चाय की चुस्की लेना। पर अपने बच्चे तक पहुंचने की बेताबी सारी दुनिया की खुशियोँ को एक ओर कर देती है।

मानती हूँ महिलाओं, लड़कियो को जॉब करना चाहिए, इससे कांफिडेंस आता है पर सच है कि बहुत कुछ हाथ से जाता भी है !!

https://www.facebook.com/Meetaagarwal1234/photos/a.516432125048551.124407.516018381756592/1811134668911617/?type=3


Thursday, 3 March 2016

माँ को नमन ------ पूनम



माँ की पुण्यतिथि(03 मार्च ) पर :


हमारे माता-पिता हम लोगों के निर्माण के लिए कितने तकलीफ और दुख उठाते हैं उसके बाद संतान को सुखी जीवन दे पाते हैं । मेरी माँ ने मेरे लिए बहुत दुख उठाया है और संयुक्त परिवार में ऊपर से काम का बोझ । अब मुझे समझ आता है कि, उनके दिमाग पर कितना बोझ था? पर कभी भी संतुलन नहीं खोया। हमेशा ही हम भाई -बहन के लिए ज़िंदगी को जिया। कभी उफ तक नहीं किया। मेरी माँ को शत-शत नमन। :हम भाई-बहन माँ-पिताजी का कहना ज़रूर मानते थे।