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Monday, 26 February 2018

बदल और बदला का अंतर


जिंदगी को बदल 
जिंदगी ने बदला 
जिंदगी ने फिर बोला 
इंसान को कैसा तोला
न राम न रहीम मिला 
झगड़ों में सिर्फ कोलाहल मिला 
दिलों में मिला आग का शोला 
न मीठी वाणी न मरहम मिला 
लोगों में कैसा समा जला 
नफरत और भूलों को भुला 
चलो चलें ऐसे जहां में 
जहां न कोई बदला हो न गिला
न कोई हो अकेला 

Sunday, 25 February 2018

डाल्फिन बन कर ------

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यह मार्मिकता भरा लेख है । इंसान क्या है ? सिर्फ पैसा ही के लिए लोग जी रहे हैं। न उद्देश्य रहा है जीवन का न कुछ है जो जैसे नचाए वैसे नाचिए। दुख होता है पर समझाया नहीं जा सकता है किसी को भी । 

Monday, 5 February 2018

संकल्प

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बापू इंसान के दुख - दर्द को कितना समझते थे ,  आज कल कौन किसकी सुनता है ?


Monday, 11 September 2017

क्या वास्तविकता में इंसान ऐसा कर सकता है ?

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कहना, पढ्ना बहुत आसान है। क्या वास्तविकता में इंसान ऐसा कर सकता है ? अगर ऐसा हो जाये तो हर व्यक्ति  संतोषी होगा, सुखी होगा। न किसी का लेना न किसी का देना । कहीं खून खराबा ही न हो। सर्वत्र शांति ही शांति हो। इंसान मान ले कि, परमात्मा ही हमारा राजा है। परमात्मा के दरबार में कहीं अन्याय है ही नहीं। 

Sunday, 17 July 2016

:काश संसार के सारे इंसान ऐसे हो जाते ?

******** हितोपदेश से बेहतर वृतांत :

एक बार एक लड़का अपने स्कूल की फीस भरने के लिए एक दरवाजे से दूसरे दरवाजे तक कुछ सामान बेचा करता था,
एक दिन उसका कोई सामान नहीं बिका और उसे बड़े जोर से भूख भी लग रही थी. उसने तय किया कि अब वह जिस भी दरवाजे पर जायेगा, उससे खाना मांग लेगा..
पहला दरवाजा खटखटाते ही एक लड़की ने दरवाजा खोला, जिसे देखकर वह घबरा गया और बजाय खाने के उसने पानी का एक गिलास माँगा..
लड़की ने भांप लिया था कि वह भूखा है, इसलिए वह एक.. बड़ा गिलास दूध का ले आई. लड़के ने धीरे-धीरे दूध पी लिया..
कितने पैसे दूं? लड़के ने पूछा.
पैसे किस बात के? लड़की ने जवाव में कहा.
माँ ने मुझे सिखाया है कि जब भी किसी पर दया करो तो उसके पैसे नहीं लेने चाहिए.
तो फिर मैं आपको दिल से धन्यवाद देता हूँ. जैसे ही उस लड़के ने वह घर छोड़ा, उसे न केवल शारीरिक तौर पर शक्ति मिल चुकी थी , बल्कि उसका भगवान् और आदमी पर भरोसा और भी बढ़ गया था..
सालों बाद वह लड़की गंभीर रूप से बीमार पड़ गयी. लोकल डॉक्टर ने उसे शहर के बड़े अस्पताल में इलाज के लिए भेज दिया..
विशेषज्ञ डॉक्टर होवार्ड केल्ली को मरीज देखने के लिए बुलाया गया. जैसे ही उसने लड़की के कस्बे का नाम सुना, उसकी आँखों में चमक आ गयी..
वह एकदम सीट से उठा और उस लड़की के कमरे में गया. उसने उस लड़की को देखा, एकदम पहचान लिया और तय कर लिया कि वह उसकी जान बचाने के लिए जमीन-आसमान एक कर देगा..
उसकी मेहनत और लग्न रंग लायी और उस लड़की कि जान बच गयी.
डॉक्टर ने अस्पताल के ऑफिस में जा कर उस लड़की के इलाज का बिल लिया..
उस बिल के कौने में एक नोट लिखा और उसे उस लड़की के पास भिजवा दिया. लड़की बिल का लिफाफा देखकर घबरागयी..
उसे मालूम था कि वह बीमारी से तो वह बच गयी है लेकिन बिल कि रकम जरूर उसकी जान ले लेगी..
फिर भी उसने धीरे से बिल खोला, रकम को देखा और फिर अचानक उसकी नज़र बिल के कौने में पैन से लिखे नोट पर गयी..
जहाँ लिखा था, एक गिलास दूध द्वारा इस बिल का भुगतान किया जा चुका है.
नीचे उस नेक डॉक्टर होवार्ड केल्ली के हस्ताक्षर थे.
ख़ुशी और अचम्भे से उस लड़की के गालों पर आंसू टपक पड़े उसने ऊपर कि और दोनों हाथ उठा कर कहा,
हे भगवान..! आपका बहुत-बहुत धन्यवाद..
आपका प्यार इंसानों के दिलों और हाथों के द्वारा न जाने कहाँ- कहाँ फैल चुका है.
अगर आप दूसरों पर.. अच्छाई करोगे तो.. आपके साथ भी.. अच्छा ही होगा ..!!
अब आपको दो में से एक चुनाव करना है..!
या तो आप इसे शेयर करके इस सन्देश को हर जगह पहुंचाएँ..
या अपने आप को समझा लें कि इस कहानी ने आपका दिल नहीं छूआ..!!
PLZZ SHARE!!!!!
साभार :
https://www.facebook.com/209184759431319/photos/a.209186616097800.1073741828.209184759431319/259134634436331/?type=3
********
काश संसार के सारे इंसान ऐसे हो जाते ? मानवीय समवेदनाओं से भरी हुई रचना प्रेरक है। अगर सारा संसार ऐसा होता तो आतंक का साया ही खत्म हो जाता। दुनिया खुशहाल होती। 
(पूनम )

Wednesday, 9 September 2015

सिर्फ दौलत से नहीं मिलतीं खुशियाँ ----


इंसान सत्ता , दौलत पर तो बहुत गरूर करता है ।अपने बलवान होने पर भी गरूर करता है। अगर आँखों में एक तिनका पड़ जाये तो सारी दादागिरी धारी की धरी रह जाती है। मामूली से तिनके को निकालने के लिए हाय-तौबा मच जाती है। सत्ता,दौलत और बल की सारी ताकत एक तिनके के आगे खत्म हो जाती है।
(पूनम)

Thursday, 16 April 2015

मानवता की सेवा--- पूनम माथुर


लेखिका-श्रीमती पूनम माथुर
इंसान भगवान को ढूँढता है.परन्तु असल में भगवान कहाँ छुपा हुआ है,किसी को पता नहीं है.परन्तु भगवान तो प्रत्येक व्यक्ति के अन्दर समाया हुआ है.प्रसिद्ध साहित्यकार राजा राधिका रमण की कहानी -''दरिद्र नारायण'' में राजा भगवान की खोज करता है.ताज उसके सिर पर बोझ या भार हो चला है.मंदिर,जंगलों,कहाँ-कहाँ नहीं उसने भगवान को ढूँढा पर भगवान उसे प्राप्त नहीं होते हैं.महर्षि के आश्रम में जब वह जाता है,भगवान की खोज करता है तो उसे महर्षि के आसन पर एक काला कलूटा कंकाल वही भिखारी बैठा दिखाई देता है जिसे उसके सिपाहियों ने पीटा था यह कह कर कि राजा की सवारी निकल रही है और तुमने अपशकुन कर दिया.

जब राजा ने उसे वहां बैठा हुआ देखा तो राजा के दिमाग में यह बात आई कि सच्ची प्रार्थना ,सच्ची पूजा,सच्ची सेवा तो मानवता की करनी चाहिए.सेवा दीन-हीन व्यक्तियों की करनी चाहिए.तभी नर में नारायण के दर्शन होंगे.अगर अपने अन्दर मानव की सेवा  करने की भावना है तो आप परमात्मा के सच्चे सेवक हैं.वही परमात्मा की सेवा है.प्राणिमात्र से प्यार करो,घृणा के भाव को ख़त्म करो ,ईर्ष्या द्वेष को मिटा दो.  

इस शरीर रूपी मंदिर में परमात्मा स्वंय आ जायेगा.कबीर जी कहते हैं स्वयं को पहचानो,अपनी जांच स्वयं करो तब और जब आप स्वयं ऐसा करने में सफल हो जायेंगे तो स्वतः ही आप अपने उद्धारक बन जायेंगे.अगर संसार का प्रत्येक प्राणी इन विचारों से ओत प्रोत हो जाए तो फिर संसार स्वर्ग की तरह हो जायेगा.संसार सुधरने लगेगा और सुन्दर लगेगा.विकार ख़त्म होने लगेंगे.

वैसे सुखद  संसार के लिए धन नहीं,अच्छा व्यक्ति चाहिए.अगर मानव विकास चाहता है तो अपने अन्दर मानवता को जगाए.अगर हम सफल जीवन की कामना करते हैं तो प्रेम और सौहार्द्र ,भाईचारे की भावना को अपने अन्दर लाना होगा.एक बार फिर अपने में सच्ची श्रद्धा की भावना लानी होगी.आत्म विश्वास को पुनः जगाना होगा.तभी हम सारी समस्याओं का सामना कर उन्हें सुलझा पाएँगे.आज हमें इसी श्रद्धा की भावना की आवश्यकता है.मनुष्य में तो इसी श्रद्धा की भावना का अंतर है कि कोई अपने से बड़ा और कोई अपने से छोटा समझता है.

हमारे पूर्वजों ने अपने आत्मविश्वासी प्रेरणा शक्ति के आधार पर हमारी सभ्यता को इतनी ऊंची सीढ़ियों पर चढ़ाया था परन्तु अब इसका पतन हो गया है,अवनति हो गयी है.अवनति तभी से शुरू हुई जब से हमने श्रद्धा और आत्मविश्वास को खोना शुरू कर दिया.हम अपने अंदर आत्मविश्वास को जगाएं और फिर मानवता को उसी जगह से ले चलें जहाँ हमारे पूर्वजों ने ला कर खड़ा किया था.किसी ने कहा है कि मानव की पूजा कौन करे? मानवता पूजी जाती है.हम सबसे पहले तो मानव बनने की कोशिश करें.अगर हम सच्चे अर्थों में मानव बन गए तो हमने मानवता की सेवा कर ली.संसार के प्राणिमात्र से प्यार करना प्रभु के विराट रूप का दर्शन करना है.जैसे जितने पदार्थ हैं सब उसी परमेश्वर के प्रतिरूप हैं.सभी शरीर उसी के हैं पशुओं व पक्षियों की भी सेवा करनी चाहिए.

जैसे सूर्य अच्छे बुरे सभी व्यक्तियों को या प्राणिमात्र को सामान रूपसे प्रकाश प्रदान करता है.गंगा का जल दुष्ट और संत सभी के लिए सामान रूप से है,समस्त प्राणिमात्र के लिए है.वृक्ष रखवाले और पेड़ काटने वाले सभी को सामान रूप से फल प्रदान करता है,उसी तरह से आप अपनी सम-दृष्टि का विकास करें.नाम और रूप भले ही अलग-अलग हैं पर उसमे जो तत्व हैं वह समान और एक ही हैं.ये सारे नाम और रूप ,संसार और वस्तु उसी पर अवलंबित हैं उसी का प्रतिबिम्ब है.

हम सभी को परमात्मा ने एक समान आधार पर जोड़ा है,इसी एकता की स्थापना पर विश्वमात्र निर्भर है.सब से प्रेम एक रूप हो कर करो.सब के सुख-दुःख साथ-साथ बांटो.चारों ओर प्रसन्नता की किरणें फूट पड़ेंगी,तभी मानवता की सच्ची सेवा होगी. राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त जी के अनुसार-

अनर्थ है कि बन्धु ही न बन्धु की व्यथा हरे
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे
यही पशु प्रवृत्ति है कि आप आप ही चरे
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे

(विशेष- यह लेख २००४ ई.में आगरा की एक त्रैमासिक पत्रिका में प्रकाशित हो चुका है.आज भी इस लेख की उपयोगिता बढ़ गयी है जब पूजा -स्थल को ले कर एक बार फिर इंसान -इंसान के बीच नफरत पैदा करने की कोशिश कुछ लोग कर रहे हैं.अतः इसे यहाँ पुनः प्रकाशित किया जा रहा है.)

Typist -यशवंत
  

Saturday, 6 October 2012

तुम चाहो तो ......

बृहस्पतिवार, 30 दिसम्बर 2010

तुम चाहो तो ......

[श्रीमती पूनम माथुर,द्वारा]

तुम चाहो तो,घृणा को प्यार में बदल दो.
तुम चाहो तो,दुःख को खुशी में बदल दो..
तुम चाहो तो,वीराने को बहार  में बदल दो.
तुम चाहो तो,पतझड़ को बसंत में बदल दो..
तुम चाहो तो,हैवान को इन्सान में बदल दो.
तुम चाहो तो, गरीबी को अमीरी में बदल दो..
तुम चाहो तो,मौत को ज़िंदगी में बदल दो.
तुम चाहो तो,अन्धकार को प्रकाश में बदल दो.
तुम चाहो तो,अज्ञानी को ज्ञानी में बदल दो...

6 टिप्‍पणियां:

  1. जीवन में जहाँ चाह होती है वहाँ राहें खुद ब खुद बनती चली जाती हैं.प्रेरणादायक बहुत ही अच्छी कविता .
    पूनम जी इस कविता के प्रकाशन हेतु बधाई और हमने तो पहली बार पढ़ी है इसलिए यहाँ प्रकाशित करने के लिए विजय जी आप का आभार.
  2. नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें
  3. काश! यह चाह जनजन के हृदय में उत्पन्न हो!!
  4. बहुत प्रेरणात्मक कविता ।
    सुन्दर प्रस्तुति ।
  5. प्रेरणादायक बहुत ही अच्छी कविता | हार्दिक बधाई।


नोट:-यह कविता प्रथम बार ब्रह्मपुत्र समाचार,आगरा क़े २२जन्वरी ०४ _०४ फरवरी २००४ ,अंक में प्रकाशित हुई थी.आज की परिस्थितियों में भी इन्सान की ताकत का एहसास कराती इस कविता को पुनः प्रकाशित करना उचित लगा.