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Monday, 11 September 2017

क्या वास्तविकता में इंसान ऐसा कर सकता है ?

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कहना, पढ्ना बहुत आसान है। क्या वास्तविकता में इंसान ऐसा कर सकता है ? अगर ऐसा हो जाये तो हर व्यक्ति  संतोषी होगा, सुखी होगा। न किसी का लेना न किसी का देना । कहीं खून खराबा ही न हो। सर्वत्र शांति ही शांति हो। इंसान मान ले कि, परमात्मा ही हमारा राजा है। परमात्मा के दरबार में कहीं अन्याय है ही नहीं। 

Thursday, 16 April 2015

मानवता की सेवा--- पूनम माथुर


लेखिका-श्रीमती पूनम माथुर
इंसान भगवान को ढूँढता है.परन्तु असल में भगवान कहाँ छुपा हुआ है,किसी को पता नहीं है.परन्तु भगवान तो प्रत्येक व्यक्ति के अन्दर समाया हुआ है.प्रसिद्ध साहित्यकार राजा राधिका रमण की कहानी -''दरिद्र नारायण'' में राजा भगवान की खोज करता है.ताज उसके सिर पर बोझ या भार हो चला है.मंदिर,जंगलों,कहाँ-कहाँ नहीं उसने भगवान को ढूँढा पर भगवान उसे प्राप्त नहीं होते हैं.महर्षि के आश्रम में जब वह जाता है,भगवान की खोज करता है तो उसे महर्षि के आसन पर एक काला कलूटा कंकाल वही भिखारी बैठा दिखाई देता है जिसे उसके सिपाहियों ने पीटा था यह कह कर कि राजा की सवारी निकल रही है और तुमने अपशकुन कर दिया.

जब राजा ने उसे वहां बैठा हुआ देखा तो राजा के दिमाग में यह बात आई कि सच्ची प्रार्थना ,सच्ची पूजा,सच्ची सेवा तो मानवता की करनी चाहिए.सेवा दीन-हीन व्यक्तियों की करनी चाहिए.तभी नर में नारायण के दर्शन होंगे.अगर अपने अन्दर मानव की सेवा  करने की भावना है तो आप परमात्मा के सच्चे सेवक हैं.वही परमात्मा की सेवा है.प्राणिमात्र से प्यार करो,घृणा के भाव को ख़त्म करो ,ईर्ष्या द्वेष को मिटा दो.  

इस शरीर रूपी मंदिर में परमात्मा स्वंय आ जायेगा.कबीर जी कहते हैं स्वयं को पहचानो,अपनी जांच स्वयं करो तब और जब आप स्वयं ऐसा करने में सफल हो जायेंगे तो स्वतः ही आप अपने उद्धारक बन जायेंगे.अगर संसार का प्रत्येक प्राणी इन विचारों से ओत प्रोत हो जाए तो फिर संसार स्वर्ग की तरह हो जायेगा.संसार सुधरने लगेगा और सुन्दर लगेगा.विकार ख़त्म होने लगेंगे.

वैसे सुखद  संसार के लिए धन नहीं,अच्छा व्यक्ति चाहिए.अगर मानव विकास चाहता है तो अपने अन्दर मानवता को जगाए.अगर हम सफल जीवन की कामना करते हैं तो प्रेम और सौहार्द्र ,भाईचारे की भावना को अपने अन्दर लाना होगा.एक बार फिर अपने में सच्ची श्रद्धा की भावना लानी होगी.आत्म विश्वास को पुनः जगाना होगा.तभी हम सारी समस्याओं का सामना कर उन्हें सुलझा पाएँगे.आज हमें इसी श्रद्धा की भावना की आवश्यकता है.मनुष्य में तो इसी श्रद्धा की भावना का अंतर है कि कोई अपने से बड़ा और कोई अपने से छोटा समझता है.

हमारे पूर्वजों ने अपने आत्मविश्वासी प्रेरणा शक्ति के आधार पर हमारी सभ्यता को इतनी ऊंची सीढ़ियों पर चढ़ाया था परन्तु अब इसका पतन हो गया है,अवनति हो गयी है.अवनति तभी से शुरू हुई जब से हमने श्रद्धा और आत्मविश्वास को खोना शुरू कर दिया.हम अपने अंदर आत्मविश्वास को जगाएं और फिर मानवता को उसी जगह से ले चलें जहाँ हमारे पूर्वजों ने ला कर खड़ा किया था.किसी ने कहा है कि मानव की पूजा कौन करे? मानवता पूजी जाती है.हम सबसे पहले तो मानव बनने की कोशिश करें.अगर हम सच्चे अर्थों में मानव बन गए तो हमने मानवता की सेवा कर ली.संसार के प्राणिमात्र से प्यार करना प्रभु के विराट रूप का दर्शन करना है.जैसे जितने पदार्थ हैं सब उसी परमेश्वर के प्रतिरूप हैं.सभी शरीर उसी के हैं पशुओं व पक्षियों की भी सेवा करनी चाहिए.

जैसे सूर्य अच्छे बुरे सभी व्यक्तियों को या प्राणिमात्र को सामान रूपसे प्रकाश प्रदान करता है.गंगा का जल दुष्ट और संत सभी के लिए सामान रूप से है,समस्त प्राणिमात्र के लिए है.वृक्ष रखवाले और पेड़ काटने वाले सभी को सामान रूप से फल प्रदान करता है,उसी तरह से आप अपनी सम-दृष्टि का विकास करें.नाम और रूप भले ही अलग-अलग हैं पर उसमे जो तत्व हैं वह समान और एक ही हैं.ये सारे नाम और रूप ,संसार और वस्तु उसी पर अवलंबित हैं उसी का प्रतिबिम्ब है.

हम सभी को परमात्मा ने एक समान आधार पर जोड़ा है,इसी एकता की स्थापना पर विश्वमात्र निर्भर है.सब से प्रेम एक रूप हो कर करो.सब के सुख-दुःख साथ-साथ बांटो.चारों ओर प्रसन्नता की किरणें फूट पड़ेंगी,तभी मानवता की सच्ची सेवा होगी. राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त जी के अनुसार-

अनर्थ है कि बन्धु ही न बन्धु की व्यथा हरे
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे
यही पशु प्रवृत्ति है कि आप आप ही चरे
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे

(विशेष- यह लेख २००४ ई.में आगरा की एक त्रैमासिक पत्रिका में प्रकाशित हो चुका है.आज भी इस लेख की उपयोगिता बढ़ गयी है जब पूजा -स्थल को ले कर एक बार फिर इंसान -इंसान के बीच नफरत पैदा करने की कोशिश कुछ लोग कर रहे हैं.अतः इसे यहाँ पुनः प्रकाशित किया जा रहा है.)

Typist -यशवंत
  

Tuesday, 25 June 2013

प्रभु की लीला---पूनम माथुर




इसे प्रभु की माया कहें या लीला। उत्तराखंड में जो कहर बरपा है। क्या आप पत्थर के भगवान को पूजने जा रहे थे? इससे तो कहीं अच्छा होता कि,रक्त दान या अंग दान कर देते तो परमात्मा की इस दुनिया को संवार सकते थे जबकि अब सम्पूर्ण अंग सड़ रहे हैं ,बह रहे हैं और प्रदूषण फैला रहे हैं। परमात्मा ने जब आपको बुद्धि व विवेक दिया है तो क्यों नहीं सोचते कि क्या गलत है और क्या सही?परमात्मा सीख देता है परंतु लोग मानते कब हैं?अपने अहंकार के मद में डूबे रहते हैं। 'कुंभ; के बाद क्या लोगों को कुछ सीख नहीं मिली?क्यों न घर में ही पूजा-पाठ करे? क्या गरीबों के लिए कुछ नहीं होता है?क्या अमरनाथ,बद्रीनाथ,केदारनाथ गरीबों के लिए नहीं होता है?परंतु उनके पास पैसे  कहाँ होते हैं?सो वो कहाँ जाएँ?क्या ये  पैसे वाले लोग,'कर'चोर लोग धन इकट्ठा करके पिकनिक मनाने जाते हैं?उनका मानना है जो पैसा हमने कमाया है हम ही उसका उपभोग करें। परंतु यह चुराया हुआ धन तो पूरी जनता का है। जनता की हाय से बचना चाहिए नहीं तो ऐसी आपदाएँ बार-बार आती ही रहेंगी। आज का राजा कल का भिखारी हो गया है। यह परमात्मा की ओर से दिया हुआ 'दंड'है या 'न्याय' जो कहिए। 'प्रकृति' किसी को  माफ नहीं करती है। परमात्मा या प्रकृति का यह इंसाफ है-इस हाथ ले उस हाथ दे। जो अपनी मेहनत के पैसे से गए होंगे वे 'अपवाद' स्वरूप बच गए हैं।

 हमारे देश में इतना पैसा है परंतु कोई 'रोटी' और कोई 'लंगोटी' के लिए जूझ रहा है तो कोई मंहगी शराब और अय्याशी में डूब रहा है। अगर इन पैसों का सही स्तेमाल होता तो कितने बेकार नौजवानों को नौकरी मिल जाती,कितनी लड़कियों की शादियाँ हो जातीं। शायद देश के 35 प्रतिशत लोगों को काम तो मिल ही जाता। आज आपदा में इन लोगों का कमाया हुआ धन पानी में बह गया। खुद लड़ कर मर रहे हैं। लाशों के ऊपर चढ़ कर 'चांडालों' की तरह भाग रहे हैं। कलयांणकारी  'शिव' ने अपना 'रौद्र तांडव' दिखाया है उसका भी तो 'दर्शन' कर लो!क्या आज प्रकृति ने अपना सही रूप नहीं दिखाया?क्यों प्रकृति के ऊपर इतना भार डाल रहे थे?इसी लिए प्रकृति को 'खफा' होना पड़ा।  

अगर अपनी कमाई को लोग नेक काम में लगाते तो न  इस तरह से मरते और परमात्मा के यहाँ नेक बंदे के रूप में नाम और  दर्ज हो जाता। बाकी लोगों को यह समझने के लिए प्रकृति और शिव ने यह उदाहरण दिया है। अभी इस वक्त 'आपदा कोष' में लोग पैसा जमा कर रहे हैं तो क्या वे हमेशा देश के नौजवानों के किए धन एकत्र नहीं कर सकते?

विदेशों में तरक्की होती है परंतु प्रकृति-जलवायु,पहाड़,नदी,नालों को छेड़ा नहीं जाता है परंतु हमारा देश तो कोरा नकलची है। इसका भुगतान तो लोग करेंगे ही। नकल के लिए भी अक्ल की ज़रूरत होती है। पेड़ काटे जा रहे हैं,कारखाने बनाए जा रहे हैं,बिजली की खपत अंधाधुंध हो रही है। तो इसका असर तो पड़ेगा ही। 

ये आपदाएँ परमात्मा की तरफ से मनुष्य की आँखें खोलने के लिए होती हैं कि प्रकृति के साथ छेड़ -छाड़ न करो  तभी मानवता सुरक्षित  रह पाएगी।  

Monday, 10 June 2013

समझना ---पूनम माथुर

शुक्रवार, 14 अक्तूबर 2011

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पूनम माथुर 
किसे कहें अपना
किसे पराया
कोई खद्दरधारी
कोई चद्दरधारी
कोई दुत्कार करे
कोई सत्कार करे
कोई समझता अपना
कोई समझता पराया
कोई कहे आत्मा
कोई कहे परमात्मा
कौन है सच्चा
कौन है  झूठा
कोई कहे एक
कोई कहे अनेक
कोई देता सजा
कोई लेता मजा
कोई देता दवा
कोई देता दगा
क्या है एकसार
क्या है विस्तार
कौन किसे बिगाड़े
कौन किसे संवारे
एक नैया आना
एक नैया जाना
समझ का फेर माना
सबको एक दिन आना-जाना
सबमे तू  ही समाया
यह किसी ने न जाना।


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12 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छी कविता लिखी है मम्मी ने।

  2. "सबमे तू ही समाया
    यह किसी ने न जाना।"
    जीवन की दौड़-धूप के बाद व्यक्ति इसी निष्कर्ष पर पहुँचता है. पूनम बहन जी ने बहुत सुंदर कविता लिखी है. बहुत बहुत आभार.

  3. बहुत सुन्दर, सार्थक कविता| धन्यवाद|

  4. बहुत बढ़िया |
    बधाई ||
    http://dineshkidillagi.blogspot.com/

  5. सच्चाई को बयाँ करती सुन्दर कविता ।

    समझ का फेर माना
    सबको एक दिन आना-जाना
    सबमे तू ही समाया
    यह किसी ने न जाना।

    बस इसी समझ की कमी रहती है ।

  6. समझ का फेर माना
    सबको एक दिन आना-जाना
    सबमे तू ही समाया
    यह किसी ने न जाना।

    बहुत गहरी बात लिए पंक्तियाँ.....

  7. बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ।

  8. bahut hi satik bate...dil ko chhoo gayi

  9. सार्थक चिंतन पूनम जी...
    सादर बधाईयां....

  10. सबमे तू ही समाया

    यही तो समझना है!
    सुंदर !

  11. जो इस बात को जानता है वो चिंता मुक्त रहता है ...

  12. बहुत ही सुन्दर लिखा है आपने
    प्रत्येक पंक्ति भावमय और अर्थपूर्ण है..