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Thursday, 15 August 2013

67 वें स्वाधीनता दिवस पर





भारत की स्वाधीनता की 67 वीं वर्षगांठ पर समस्त देशवासियों को हार्दिक मंगलकामनाए

Tuesday, 25 June 2013

प्रभु की लीला---पूनम माथुर




इसे प्रभु की माया कहें या लीला। उत्तराखंड में जो कहर बरपा है। क्या आप पत्थर के भगवान को पूजने जा रहे थे? इससे तो कहीं अच्छा होता कि,रक्त दान या अंग दान कर देते तो परमात्मा की इस दुनिया को संवार सकते थे जबकि अब सम्पूर्ण अंग सड़ रहे हैं ,बह रहे हैं और प्रदूषण फैला रहे हैं। परमात्मा ने जब आपको बुद्धि व विवेक दिया है तो क्यों नहीं सोचते कि क्या गलत है और क्या सही?परमात्मा सीख देता है परंतु लोग मानते कब हैं?अपने अहंकार के मद में डूबे रहते हैं। 'कुंभ; के बाद क्या लोगों को कुछ सीख नहीं मिली?क्यों न घर में ही पूजा-पाठ करे? क्या गरीबों के लिए कुछ नहीं होता है?क्या अमरनाथ,बद्रीनाथ,केदारनाथ गरीबों के लिए नहीं होता है?परंतु उनके पास पैसे  कहाँ होते हैं?सो वो कहाँ जाएँ?क्या ये  पैसे वाले लोग,'कर'चोर लोग धन इकट्ठा करके पिकनिक मनाने जाते हैं?उनका मानना है जो पैसा हमने कमाया है हम ही उसका उपभोग करें। परंतु यह चुराया हुआ धन तो पूरी जनता का है। जनता की हाय से बचना चाहिए नहीं तो ऐसी आपदाएँ बार-बार आती ही रहेंगी। आज का राजा कल का भिखारी हो गया है। यह परमात्मा की ओर से दिया हुआ 'दंड'है या 'न्याय' जो कहिए। 'प्रकृति' किसी को  माफ नहीं करती है। परमात्मा या प्रकृति का यह इंसाफ है-इस हाथ ले उस हाथ दे। जो अपनी मेहनत के पैसे से गए होंगे वे 'अपवाद' स्वरूप बच गए हैं।

 हमारे देश में इतना पैसा है परंतु कोई 'रोटी' और कोई 'लंगोटी' के लिए जूझ रहा है तो कोई मंहगी शराब और अय्याशी में डूब रहा है। अगर इन पैसों का सही स्तेमाल होता तो कितने बेकार नौजवानों को नौकरी मिल जाती,कितनी लड़कियों की शादियाँ हो जातीं। शायद देश के 35 प्रतिशत लोगों को काम तो मिल ही जाता। आज आपदा में इन लोगों का कमाया हुआ धन पानी में बह गया। खुद लड़ कर मर रहे हैं। लाशों के ऊपर चढ़ कर 'चांडालों' की तरह भाग रहे हैं। कलयांणकारी  'शिव' ने अपना 'रौद्र तांडव' दिखाया है उसका भी तो 'दर्शन' कर लो!क्या आज प्रकृति ने अपना सही रूप नहीं दिखाया?क्यों प्रकृति के ऊपर इतना भार डाल रहे थे?इसी लिए प्रकृति को 'खफा' होना पड़ा।  

अगर अपनी कमाई को लोग नेक काम में लगाते तो न  इस तरह से मरते और परमात्मा के यहाँ नेक बंदे के रूप में नाम और  दर्ज हो जाता। बाकी लोगों को यह समझने के लिए प्रकृति और शिव ने यह उदाहरण दिया है। अभी इस वक्त 'आपदा कोष' में लोग पैसा जमा कर रहे हैं तो क्या वे हमेशा देश के नौजवानों के किए धन एकत्र नहीं कर सकते?

विदेशों में तरक्की होती है परंतु प्रकृति-जलवायु,पहाड़,नदी,नालों को छेड़ा नहीं जाता है परंतु हमारा देश तो कोरा नकलची है। इसका भुगतान तो लोग करेंगे ही। नकल के लिए भी अक्ल की ज़रूरत होती है। पेड़ काटे जा रहे हैं,कारखाने बनाए जा रहे हैं,बिजली की खपत अंधाधुंध हो रही है। तो इसका असर तो पड़ेगा ही। 

ये आपदाएँ परमात्मा की तरफ से मनुष्य की आँखें खोलने के लिए होती हैं कि प्रकृति के साथ छेड़ -छाड़ न करो  तभी मानवता सुरक्षित  रह पाएगी।  

Wednesday, 19 June 2013

भूखी नंगी जनता---पूनम माथुर

27-01-2012 को लिखित 
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कैसा है यह गणतन्त्र का त्यौहार
कोई भूखा सोता है कोई नंगा रहता है
कोई बेघर होता है कोई खाते-खाते उल्टी करता है
कैसा है यह गणतन्त्र का त्यौहार
हाँ-हाँ सब करते हैं पर ना ही कोई कुछ करने को तैयार
कैसे होगा भोली-भाली जनता का उद्धारदुष्ट,दुशप्रवहार,संस्कार 
कैसे हम मनाएंगे यह गणतन्त्र का त्यौहार
जब तक हम सभी नहीं लाएँगे सच्चा प्यार-दुलार
तब तक कैसे होगा प्राणियों का सत्कार
छोड़ दो यह नारेबाजी यह सब करना है बेकार
जब तक नहीं पनपते तुम्हारे अंदर अच्छे संस्कार
क्यों करते हो झूठे आडंबर क्यों नहीं करते हो उनका बहिष्कार
जब तक नहीं होगा इंसान के अंदर इंसानियत का संचार
मत करो 'दिखावा' का दुष्प्रचार
दुष्टों को क्यों नहीं लगाते फटकार
कैसे मनाएँ गणतन्त्र का त्यौहार
अपने अन्तर्मन मे ढूंढो अच्छे विचार
तभी मना सकोगे गणतन्त्र का त्यौहार
दुष्टों और भ्रष्टों ने लोगों का जीना और' तंत्र' को कर रखा है लाचार
अमर शाहीदों की कुर्बानी को कर रखा है बेकार
इन्हें मन व जड़ से उखाड़ फेंको तभी होगा गणतन्त्र का सच्चा त्यौहार



जय हिन्द  


(पूनम माथुर)

Tuesday, 18 June 2013

साथ

आया बसंत
गया पतझड़
माया झूमा
छाया उल्लास
सब आशावान
करें सम्मान
चमका दिनमान
कोयल बोली
बौर मतवाली
भौरा बैठा
झूमे डालीडाली
कोयल मतवारी
कुहुक प्यारी
विरहन बेचारी
सरसों पीलीपीली
ललकारे हरियाली
रंग धानी
यौवन खेले
चाल मस्तानी
मदनमोहन मन
खेले अठखेली
दिन होली
रात दीवाली
ऐसी अभिलाषा
पूरी हो
जाए जीवन
की आस प्यास
मिले सबको
सबका साथ
यही अर्थ
है मधुमास


(श्रीमती पूनम माथुर)

Saturday, 15 June 2013

समझ नहीं आया---पूनम माथुर

शनिवार, 5 नवम्बर 2011

समझ नहीं आया

अच्छा लिखें आप लोग खिंचे आएंगे ,
बुरा  * लिखें आप लोग दूर जाएँगे।
घमंड न कर इंसान यह सब समझ जाएँगे,
अपने को हैवान न बना ये  सब समझ जाएँगे।
दुनिया को नई राह दिखा जाएँगे ,
ऐसा काम कर जाएँगे।
नाम से क्या मतलब है? अगर दुनिया को नई राह दिखा जाएँगे,
तब मानव,मानव बन जाएँगे इंसान कहला जाएँगे।
पच्चीस -पचास-पिच्छतर का यह जीवन क्यों बर्बाद कर जाएँगे?
सब मे सब का यह झलक दिखा जाएँगे ।
लाल न होने पाये यह धरती ऐसा प्रयास कर जाएँगे,
हरी-भरी धरती हो ऐसा संकल्प करवा जाएँगे।
तमसो माँ ज्योतिर्मय का दुनिया मे राज करवा जाएँगे,
तब विधाता का एक छोटा सा शिष्य कहलाएंगे।
न कोई मजदूर हो,न कोई मालिक यह बतलाने की कोशिश कर जाएँगे,
सब का मालिक एक है यह बतलाने की कोशिश कर जाएँगे।


--पूनम माथुर


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10 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छा लिखें आप लोग खिंचे आएंगे ,
    बुरा लिखें आप लोग दूर जाएँगे।
    घमंड न कर इंसान यह सब समझ जाएँगे,
    अपने को हैवान न बना ये सब समझ जाएँगे।सारगर्भित रचना....
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  2. मानवता से परिपूर्ण संदेश देती सुंदर रचना.
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  3. ब्लोगर्स के लिए सार्थक सन्देश देती रचना ।
    बहुत सुन्दर ।
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  4. रहा हौसला अगर यही,अमल पे लाने में
    नहीं तनिक संशय कि मंजिल हासिल कर जाएंगे
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  5. सार्थक सन्देश....
    सच्ची अभिव्यक्ति....
    सादर
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  6. बहुत ही सुन्दर,, सिख देती रचना
    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  7. सटीक बात ..अच्छा सन्देश